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Toggleभारतीय मुद्रा ‘रुपया’ दिन-प्रतिदिन अमेरिकी डॉलर के सामने अपने निम्न इतर पर जा रहा है और इस बात को वर्ष 2024 और 2025 के आँकड़े सिद्ध भी करते नजर आ रहे हैं। जहाँ अक्टूबर 2024 में रुपया अपने रिकॉर्ड ऑल टाइम लो, 84.09 रुपए प्रति डॉलर पर पहुँच गया था।
इसी प्रकार इस वर्ष (2025) के अंत तक आते-आते भारतीय रुपये में ऐतिहासिक गिरावट देखने को मिली जहाँ पहली बार 1 डॉलर के मुकाबले रुपया 91 रुपए के पार निकल गया। जिसका प्रतिकूल असर शेयर मार्केट में भी देखने को मिला।
आइए इस लेख में इस घटना को प्रभावित होने वाले कारकों और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा करते हैं वहीं साथ ही साथ जानने का प्रयास करेंगे कि इसके पीछे कौन-कौन से कारण जिम्मेदार हो सकते हैं और क्या रुपये के गिरने से मात्र नुकसान ही होता है या इसके अन्य लाभ भी हैं।
Key Factors Declining Of Indian Rupee : जानें पूरी खबर विस्तार से…

जहाँ स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय मुद्रा ‘रुपया’, 1 अमेरिकी डॉलर के सामने लगभग 1 रुपये से 3 रुपये के बीच था वह आज स्वतंत्रता के लगभग 78 वर्ष बाद 2025 में 90 रुपये के आस-पास पहुँच गया है।
इसका ताज़ा उदाहरण (Key Factors Declining Of Indian Rupee) वर्ष 2024 व 2025 के आँकड़े हैं। जहाँ अक्टूबर 2024 में रुपया अपने रिकॉर्ड ऑल टाइम लो, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 11 पैसे की गिरावट देखने को मिली और यह 84.09 रुपए प्रति डॉलर के अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ था। इससे पहले 8 अगस्त 2024 को डॉलर के मुकाबले रुपया 83.99 के अपने सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ था।
इसी प्रकार से वर्ष 2025 में 16 दिसंबर को पहली बार डॉलर के मुकाबले रुपया 91 के पार निकल गया। कारोबार के दौरान रुपए ने डॉलर के मुकाबले 11:45 बजे 91.14 रुपए का ऑल टाइम लो बनाया। इससे पहले डॉलर के मुकाबले रुपया सबसे निचले स्तर 90.87 पर ओपन हुआ था। PTI के अनुसार 9 पैसे कमजोर होकर ओपन हुआ था। वहीं 15 दिसंबर को भी इसमें 25 पैसे की गिरा वट आई थी।
Key Factors Declining Of Indian Rupee : रुपये में गिरावट आने के प्रमुख कारण…

वर्ष 2025 से पूर्व की परिस्थितियाँ राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भिन्न थी जिस कारण रुपये में गिरावट आने के प्रमुख कारण भी वर्तमान स्थिति से भिन्न मानी जा सकती है जिनमें से प्रमुख हैं…
- कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें (Rising Crude Oil Prices)-:
भारत तेल आयात पर काफी हद तक अन्य देशों पर निर्भर है, और बढ़ती कीमतें डॉलर की आवश्यकता को बढ़ाती हैं।
2. विदेशी निधि का बहिर्वाह (Foreign Fund Outflows)-:
चीन द्वारा अपनी धीमी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से उठाए गए तात्कालिक मौद्रिक और राजकोषीय उपायों से आकर्षित होकर वैश्विक निवेशक भारत से धन निकाल रहे थे और चीन में निवेश स्थानांतरित कर रहे थे।
3. विदेशी बैंकों से डॉलर की बढ़ती मांग (Higher Dollar Demand From Foreign Banks)-:
डॉलर की बढ़ती मांग का असर रुपये पर भी पड़ाता है।
4. विदेशी संस्थागत निवेशक की बिक्री [Foreign Institutional Investor (FII) Selling]-:
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने हाल के दिनों में “भारत बेचो, चीन खरीदो” “Sell India, Buy China” रणनीति के तहत भारतीय शेयरों की भारी बिक्री की थी। FPIs ने 1 से 11 अक्टूबर के बीच 58,711 करोड़ रुपये मूल्य के इक्विटी और 1,635 करोड़ रुपये के डेट शेयर बेचे थे।
परंतु वर्ष 2025 के पश्चात से परिस्थितियाँ भारत के संदर्भ में वैश्विक स्तर पर और भी प्रतिकूल हुईं जिनमें से प्रमुख हैं…
- व्यापार समझौते की अनिश्चितता भविष्य के दृष्टिकोण को धूमिल करती दिखीं (Trade deal uncertainty clouds outlook)-:
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की उम्मीदें बार-बार लड़खड़ाती रही हैं, जिससे व्यापारी निकट भविष्य में होने वाले निवेश प्रवाह को लेकर सतर्क हो गए हैं। ये अनिश्चिततायें और भी बढ़ गई है क्योंकि अमेरिका कई एशियाई निर्यातकों पर उच्च शुल्क लगाना जारी रखे हुए है, जिससे निर्यात मार्जिन कम हो रहा है।
2. पूंजी बहिर्वाह से बढ़ता दबाव (Capital outflows add pressure)-:
वैश्विक फंडों ने दिसंबर में अब तक भारतीय शेयरों से लगभग 1.6 बिलियन डॉलर निकाले हैं। जिससे दो महीनों का निवेश प्रवाह उलट गया। उन्होंने स्थानीय ऋणों में अपनी हिस्सेदारी भी कम कर दी है। इस वापसी से पता चलता है कि रुपये में मूल्यांकित परिसंपत्तियों के लिए विदेशी निवेशकों की रुचि सीमित है, क्योंकि निवेशक सुरक्षित डॉलर विकल्पों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
विदेशी निवेशकों ने इस महीने के पहले दो हफ्तों में भारतीय शेयर बाजार से 17,955 करोड़ रुपये (2 अरब अमेरिकी डॉलर) निकाल लिए। इससे 2025 तक कुल बहिर्वाह 1.6 लाख करोड़ रुपये (18.4 अरब अमेरिकी डॉलर) हो गया है।
यह तीव्र निकासी नवंबर में 3,765 करोड़ रुपये के शुद्ध बहिर्वाह के बाद हुई है, जिससे घरेलू शेयर बाजारों पर दबाव बढ़ गया है।
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के आंकड़ों के अनुसार, FPIs ने 1 से 12 दिसंबर के बीच भारतीय इक्विटी से कुल 17,955 करोड़ रुपये निकाले।
Key Factors Declining Of Indian Rupee : रुपए में गिरावट के लाभ और नुकसान…
- लाभ-
- एक्सपोर्टर्स को ज्यादा मुनाफा।
- पर्यटकों के लिए भारत सस्ता।
- मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा।
- डॉलर भेजने पर ज्यादा रुपए।
- नुकसान-
- महंगाई बढ़ेगी।
- तेल-सोना महंगे।
- विदेश में पढ़ाई-घूमना महंगा।
- विदेशी निवेश घटेगा।
Key Factors Declining Of Indian Rupee : करेंसी की कीमत कैसे तय होती है?
अंग्रेजी में करेंसी डेप्रिशिएशन से तात्पर्य है कि डॉलर की तुलना में किसी भी अन्य करेंसी की वैल्यू घटे तो उसे मुद्रा का गिरना, टूटना, कमजोर होना होता है। प्रत्येक देश के पास फॉरन करेंसी रिजर्व होता है, जिससे वह इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन करता है। फॉरन रिजर्व के घटने और बढ़ने का असर करेंसी की कीमत पर दिखता है।
यदि भारत के फॉरन रिजर्व में डॉलर, अमेरिका के रुपयों के भंडार के बराबर होगा तो रुपये की कीमत स्थिर रहेगी। हमारे पास डॉलर घटे तो रुपया कमजोर होगा, बढ़े तो रुपया मजबूत होगा। इसे फ्लोटिंग रेट सिस्टम कहते हैं। जिसे भारत ने 1975 से अपनाया है।
करेंसी की कीमत को तय करने का दूसरा एक तरीका भी है। जिसे Pegged Exchange Rate कहते हैं अर्थात फिक्स्र् एक्सचेंज रेट। जिसमें एक देश की सरकार किसी दूसरे देश के मुकाबले अपने देश की करेंसी की कीमत को फिक्स कर देता है। यह आम तौर पर व्यापार बढ़ाने और महंगाई को नियंत्रित किरन के लिए किया जाता है।
Key Factors Declining Of Indian Rupee : किसी करेंसी की डिमांड कम और ज्यादा कैसे होती है?
किसी करेंसी की डिमांड कम और ज्यादा उसकी मांग और स्थिरता से होती है। डॉलर दुनिया की सबसे बड़ी करेंसी है। दुनियाभर में सबसे ज्यादा कारोबार डॉलर में ही होता है। हम जो सामान विदेश से मँगवाते हैं उसके बदले हमें डॉलर देना पड़ता है और जब हम बेचते हैं तो हमें डॉलर मिलता है।
- फॉरन एक्सचेंज मार्केट क्या होता है?
आसान भाषा में कहें तो फॉरन एक्सचेंज एक अन्तर्राष्ट्रिय बाजार है जहाँ दुनियाभर की मुद्राएुं खरीदी और बेची जाती हैं। यह बाजार डिर्सेंट्रलाइज्र्ड होती है। यहाँ एक निश्चित रेट पर एक करेंसी के बदले दूसरी करेंसी खरीदी या बेची जाती है. दोनों करेंसी जिस भाव पर खरीदी-बेची जाती है उसे ही एक्सचेंज रेट कहते हैं। यह एक्सचेंज रेट मांग और आपूर्ति के सिद्धांत के हिसाब से घटता-बढ़ता रहा है।

वैश्विक स्तर पर अधिकांश मुद्राओं की तुलना डॉलर से होती है। रुपये की डॉलर से ही तुलना क्यों होती है? इस सवाल का जवाब छिपा है द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए ‘ब्रेटन वुड्स एग्रीमेंट’ में। इस समझौते में न्यूट्रल ग्लोबल करेंसी बनाने का प्रस्ताव रखा गया था।
उस समय युद्धग्रस्त पूरी दुनिया में अमेरिका आर्थिक तौर पर मजबूत होकर उभरा था। ऐसे में अमेरिकी डॉलर को दुनिया की रिजर्व करेंसी के रूप में चुना गया और पूरी दुनिया की करेंसी के लिए डॉलर को एक मापदंड के रूप में प्रयोग किया जाने लगा।
- दुनिया में 85% व्यापार यूएस डॉलर से होता है-
- दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों में 64% विदेशी करेंसी के तौर पर डॉलर है।
- अमेरिकी डॉलर को स्टेबल करेंसी माना जाता है।
- दुनियाभर में 39% कर्ज यूएस डॉलर में दिए जाते हैं।
Key Factors Declining Of Indian Rupee : रुपये के लिए भविष्य की संभावनाएं, क्या रुपये की कीमत गिरकर 100 डॉलर प्रति डॉलर तक जा सकती है?

अक्षत गर्ग (Head of Research and Product at Choice Wealth) के अनुसार, 31 मार्च, 2026 तक रुपये का 100/डॉलर तक पहुंचना एक चरम स्थिति होगी, न कि सामान्य स्थिति।
“रुपया वर्तमान में लगभग 90.8–91.1 रुपये (16 दिसंबर, 2025) के आसपास कारोबार कर रहा है, जिसका अर्थ है कि 100 रुपये तक पहुंचने के लिए अपेक्षाकृत कम समय में लगभग 10% मूल्यह्रास की आवश्यकता होगी।
गर्ग ने समझाया कि “इस तरह की गिरावट के लिए एक ‘परिपूर्ण संकट’ की आवश्यकता होगी — फेड द्वारा अप्रत्याशित सख्ती से प्रेरित तीव्र और निरंतर वैश्विक डॉलर की वृद्धि, भारत से बड़े पैमाने पर और निरंतर पोर्टफोलियो बहिर्वाह, और व्यापार की प्रतिकूल शर्तों में झटके, विशेष रूप से तेल और आयात लागत में उल्लेखनीय वृद्धि,”।
आर्थिक जानकारों का मानना है कि आगे चलकर रुपये का भविष्य अस्थिर प्रतीत होता है। विश्लेषकों का अनुमान है कि विदेशी निवेशकों (FII) की निकासी और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं—विशेष रूप से मध्य पूर्व में जारी तनावों के बीच—से रुपये पर भारी दबाव पड़ेगा। शेयरखान (Sharekhan) के शोध विश्लेषक अनुज चौधरी निकट भविष्य में रुपये के प्रति नकारात्मक रुझान की आशंका जताते हैं।
हालांकि, (Key Factors Declining Of Indian Rupee) कच्चे तेल की कीमतों में संभावित गिरावट और टैरीफ मतभेद को सुलझाकर रुपये को कुछ हद तक सहारा प्रदान कर सकता है।
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